आज बहुत बदल चुका हूँ मैं, यह जगह भी अपनी सी लगती है, रूरकी की इन तंग गलियों से, कड़कती धूप से , शोर में बिखरे बाज़ार से , न जाने कब रिश्ता जुड़ गया | पर आज भी जब उस वक्त को याद करता हूँ, तो पाता हूँ उसी कशमकश को फिर से ख़ुद में समाता हुआ | मेरा हमेशा से मानना है की कविताओं के पीछे की प्रेरणा हमारे अनुभव ही होते हैं | वो अकेले से दिन जब काटे नही कटते थे, घर की यादों का साया जब आठों पहर मुझ पर छाया रहता था, मैं हॉस्टल के कमरे की सिटकनी बंद कर सबसे छुप के रोया करता था | उस वक्त की दास्ताँ बयान करने को तब मेरी कलम ख़ुद ही चल पड़ी थी , और मैंने पाया कि मेरे पास कुछ तो है जिसके सहारे मुझे एक बार फिर उभरना है और एक नया मुकाम पाना है | दुनिया इसको खुदा कहती है,
अकेला नही हूँ
इन बिखरे बिखरे सनाटों में , हलकी चहला कदमी सी है,दिन तो पिघला पिघला सा है, पर रात ये कैसी जमी सी है|
सूरज जागा, पंछी जागे, दुनिया संग मैं भी जाग चला,
सूरज भागा , पंछी भागे, दुनिया संग मैं भी भाग चला|
तेरी रजा में राज़ी रहने कि, मेरी तरफ़ से अब हामी सी है|
छोद्द आया मैं महके घर को, और बाँध लिया घायल पर को,
उड़ चला छोद्द अपने डर को, न छोद्दा पर तेरे दर को|
तू बिना पुकारे दौड़ आया, पर टाँगे मेरी थमी सी है|
जब पेडो कि हरियाली से, ये धूप तेरी कट कर आई,
जब तेरे सच्चे सिमरन को , रूह मेरी रट कर आई|
फिर दिखा तू चारों और मुझे , न नज़र मेरी तब हट पायी,
औकात थी क्या तन्हाई कि, न साथ मेरे वो सट पायी|
तू न होता तो क्या होता, क्यूँ सोचूँ वक्त कि कमी सी है|



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