The first rain of this season, and luckily i was at home. The sky turned deep orange . I stood in the rain for hours.
The birth place is always special for everybody. But the most special place is always the one where you spent your childhood. I miss my times as child, and i miss that place too. I wish if i could have gone back to my childhood as i go back to my city. But oops, it is not possible. I am a dreamer, a daydreamer. And i dreamt that day too. Lying on the wall of my terrace at home, i saw i am lost in my city, i saw those long walks in fog with honey, i saw those half listened stories from my brother, i saw myself starving for basic of the things, i saw the time when our home was built, i saw those long sessions of hide and seek, i saw those thrilling thunderstorms i always enjoyed, i saw the time when golu met with an accident, i saw my first kiss and the tears that rolled down my eyes after that, i saw those endless talks with friends on terrace in summer nights, i saw those strange fantasies of bombing our city, i saw the frog i killed by dropping him from second floor, and many more, random , unchronolized, mixed.
I miss my city and sure to miss it more in future. Sorry, i can't help myself.
रातरानी की खुशबुएँ घोलता मेरा शहर |
हर सांस में है कुछ बोलता मेरा शहर |
जीने की अदा को रोशन सा करता है,
उम्रों से बसता है, यौवन न ढलता है,
थकता न कभी, चलता मेरे साथ मेरा शहर |
कभी अड़ियल सा रहता, कभी डोलता मेरा शहर,
हर सांस में है कुछ बोलता मेरा शहर |
मद्धम सी चांदनी में इसकी छाती पर लेटे,
खिलते हैं प्यार यहाँ आसमां को लपेटे,
करते हुए मुझसे मोहब्बत की बातें मेरा शहर |
इस गुफ्तगू में हजारों राज़ खोलता मेरा शहर,
हर सांस में है कुछ बोलता मेरा शहर |
पर पिछले कुछ दिनों से है रुसवा सा मुझसे,
चला गया जो इसको छोड़, रखता शिकवा सा मुझसे,
रोज़ आता आदत से मजबूर मेरा शहर |
और मुझको मेरे घर में टटोलता मेरा शहर,
हर सांस में है कुछ बोलता मेरा शहर |
सोमवार, 7 सितंबर 2009
मंगलवार, 28 जुलाई 2009
if you were mine
I wish if you were mine,
I would hold your hand,
and pass my breath on your palm,
and change all your lifelines,
and sublime all your difficulties and make you calm.
I wish if you were mine,
I would keep you in my arms,
and take all your pain and strife,
still carrying them on my back,
as they are yours.
I wish if you were mine,
I would listen to your every word,
and your every silence,
and answer your every question,
and enjoy every nonsense.
I wish if you were mine,
I would drink every drop of your tears,
standing at your feet,
and give you every drop of my blood,
before it makes my heart beat.
I wish if you were mine.
I wish if you were mine.
अकेला नही हूँ |
It was three years back, when i came to IIT Roorkee. An innocent child , who has never been out of his home for past eighteen years, set out for a new journey. All alone, with stranger faces around.
आज बहुत बदल चुका हूँ मैं, यह जगह भी अपनी सी लगती है, रूरकी की इन तंग गलियों से, कड़कती धूप से , शोर में बिखरे बाज़ार से , न जाने कब रिश्ता जुड़ गया | पर आज भी जब उस वक्त को याद करता हूँ, तो पाता हूँ उसी कशमकश को फिर से ख़ुद में समाता हुआ | मेरा हमेशा से मानना है की कविताओं के पीछे की प्रेरणा हमारे अनुभव ही होते हैं | वो अकेले से दिन जब काटे नही कटते थे, घर की यादों का साया जब आठों पहर मुझ पर छाया रहता था, मैं हॉस्टल के कमरे की सिटकनी बंद कर सबसे छुप के रोया करता था | उस वक्त की दास्ताँ बयान करने को तब मेरी कलम ख़ुद ही चल पड़ी थी , और मैंने पाया कि मेरे पास कुछ तो है जिसके सहारे मुझे एक बार फिर उभरना है और एक नया मुकाम पाना है | दुनिया इसको खुदा कहती है,
दिन तो पिघला पिघला सा है, पर रात ये कैसी जमी सी है|
सूरज जागा, पंछी जागे, दुनिया संग मैं भी जाग चला,
सूरज भागा , पंछी भागे, दुनिया संग मैं भी भाग चला|
तेरी रजा में राज़ी रहने कि, मेरी तरफ़ से अब हामी सी है|
छोद्द आया मैं महके घर को, और बाँध लिया घायल पर को,
उड़ चला छोद्द अपने डर को, न छोद्दा पर तेरे दर को|
तू बिना पुकारे दौड़ आया, पर टाँगे मेरी थमी सी है|
जब पेडो कि हरियाली से, ये धूप तेरी कट कर आई,
जब तेरे सच्चे सिमरन को , रूह मेरी रट कर आई|
फिर दिखा तू चारों और मुझे , न नज़र मेरी तब हट पायी,
औकात थी क्या तन्हाई कि, न साथ मेरे वो सट पायी|
तू न होता तो क्या होता, क्यूँ सोचूँ वक्त कि कमी सी है|
आज बहुत बदल चुका हूँ मैं, यह जगह भी अपनी सी लगती है, रूरकी की इन तंग गलियों से, कड़कती धूप से , शोर में बिखरे बाज़ार से , न जाने कब रिश्ता जुड़ गया | पर आज भी जब उस वक्त को याद करता हूँ, तो पाता हूँ उसी कशमकश को फिर से ख़ुद में समाता हुआ | मेरा हमेशा से मानना है की कविताओं के पीछे की प्रेरणा हमारे अनुभव ही होते हैं | वो अकेले से दिन जब काटे नही कटते थे, घर की यादों का साया जब आठों पहर मुझ पर छाया रहता था, मैं हॉस्टल के कमरे की सिटकनी बंद कर सबसे छुप के रोया करता था | उस वक्त की दास्ताँ बयान करने को तब मेरी कलम ख़ुद ही चल पड़ी थी , और मैंने पाया कि मेरे पास कुछ तो है जिसके सहारे मुझे एक बार फिर उभरना है और एक नया मुकाम पाना है | दुनिया इसको खुदा कहती है,
अकेला नही हूँ
इन बिखरे बिखरे सनाटों में , हलकी चहला कदमी सी है,दिन तो पिघला पिघला सा है, पर रात ये कैसी जमी सी है|
सूरज जागा, पंछी जागे, दुनिया संग मैं भी जाग चला,
सूरज भागा , पंछी भागे, दुनिया संग मैं भी भाग चला|
तेरी रजा में राज़ी रहने कि, मेरी तरफ़ से अब हामी सी है|
छोद्द आया मैं महके घर को, और बाँध लिया घायल पर को,
उड़ चला छोद्द अपने डर को, न छोद्दा पर तेरे दर को|
तू बिना पुकारे दौड़ आया, पर टाँगे मेरी थमी सी है|
जब पेडो कि हरियाली से, ये धूप तेरी कट कर आई,
जब तेरे सच्चे सिमरन को , रूह मेरी रट कर आई|
फिर दिखा तू चारों और मुझे , न नज़र मेरी तब हट पायी,
औकात थी क्या तन्हाई कि, न साथ मेरे वो सट पायी|
तू न होता तो क्या होता, क्यूँ सोचूँ वक्त कि कमी सी है|
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